महाराणा प्रताप की जीवनी | Maharana Pratap History In Hindi

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भारतवर्ष की भूमि हमेशा से वीरों की जन्मभूमि रही है। भारत के इतिहास में बहुत से वीरों की वीरगाथाएँ पढ़ने को मिल जाती है। आज हम आपको maharana pratap history in hindi के बारे में बताने जा रहे हैं। इस धरती के कण कण में वीरों की शहादत की अमर कहानियाँ छुपी हैं। ऐसे ही वीरों की धरती राजस्थान के एक महान राजा के बारे में आज हम आपको बताने जा रहे हैं जिनका नाम था महाराणा प्रताप

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कक्षा 6,7,8,9 एवं 10 में भारत के महान नायकों के बारे में पूछा जाता है। तब ये लेख आपके काम आ सकता है। इसके अतिरिक्त हमे अपनी अगली पीढ़ी को भी भारत के इतिहास के बारे में अवगत करना चाहिए तो ये लेख पढ़ के आप अपने बच्चों को वीरता की महान गाथायें सुना सकते हैं, तो चलिए शुरू करते हैं।

Maharana Pratap History In Hindi – महाराणा प्रताप का इतिहास

क्रमांकजीवन परिचय बिंदुप्रताप का जीवन परिचय
1पिता का नाम राणा उदयसिंह
2माता का नाम जयवंता बाई जी
3जन्म9 मई 1540
4पत्नी का नाम अजबदे
5पुत्रअमर सिंह
6मृत्यु29 जनवरी 15 97
7घोड़े का नामचेतक
8घोड़े की मृत्यु21 जून 1576

जन्म परिचय (Maharana Pratap Ka Janm) –

महाराणा प्रताप का पूरा नाम राजा महाराणा प्रताप सिंह था। महाराणा प्रताप का जन्म 9 मई 1540 ई को राजस्थान के कुम्भलगढ़ किले में पिता राणा उदय सिंह(उदय सिंह द्वितीयद्ध) और माता महारानी जयवंता बाई के घर हुआ था। उनकी 3 भाई और 2 दत्तक बहनें भी थीं। उनके पिता उदय सिंह द्वितीय मेवाड़ के राजा थे जिनकी राजधानी चित्तौड़ थी। विक्रमी संवत कैलेंडर के अनुसार हर साल ज्येष्ठ मास की शुक्ल पक्ष तृतीया को महाराणा प्रताप की जयंती मनाई जाती है।

परिवारिक परिचय (Paarivaarik Parichay) –

महाराणा प्रताप के पिता महाराणा उदय सिंह और माता जयवंता बाई थीं, जो पाली के सोंगरा अखैराज की पुत्री थीं। बचपन में सभी लोग महाराणा प्रताप को कीका के नाम से पुकारते थे। महाराणा प्रताप का बचपन भील समुदाय के साथ बीता, भीलों के साथ वे युद्ध की कला सीखते थे, भील ​​अपने बेटे को कीका कहते हैं, इसलिए भील महाराणा को कीका कहते थे।

राजपुताना राज्यों में मेवाड़ का एक विशेष स्थान है, जिसमें इतिहास के गौरव बप्पा रावल, खुमान प्रथम, महाराणा हम्मीर, महाराणा कुंभा, महाराणा सांगा, उदय सिंह और वीर शिरोमणि महाराणा प्रताप ने जन्म लिया है। मेवाड़ में सिसोदिया वंश के महाराणा प्रताप उदयपुर के राजा थे। उनके परिवार के देवता एकलिंग महादेव हैं। मेवाड़ के राणाओं के आराध्यदेव एकलिंग महादेव का मेवाड़ के इतिहास में बहुत महत्व है। एकलिंग महादेव का मंदिर उदयपुर में स्थित है। मेवाड़ के संस्थापक बप्पा रावल ने 8वीं शताब्दी में इस मंदिर का निर्माण कराया था और एकलिंग की मूर्ति की स्थापना की थी।

प्रारंभिक जीवन (Praarambhik Jeevan) –

महाराणा प्रताप का राज्याभिषेक गोगुन्दा में हुआ था। युद्ध की भयावहता के बीच राणा उदय सिंह ने चित्तौड़ छोड़ दिया और अरावली पर्वत पर डेरा डाला और उदयपुर के नाम से एक नए शहर की स्थापना की, जो उनकी राजधानी भी बनी। अपनी मृत्यु के समय, उदय सिंह ने भाटियानी रानी से लगाव के कारण अपने छोटे बेटे जगमल को सिंहासन सौंप दिया। जबकि प्रताप ज्येष्ठ पुत्र होने के कारण सिंहासन के उत्तराधिकारी थे।

उदउदय सिंह के फैसले का उस समय के सरदारों और जागीरदारों ने भी विरोध किया था। दूसरी ओर मेवाड़ के लोगों का भी महाराणा प्रताप से लगाव था। जब जगमल को गद्दी मिली, तो जनता में विरोध और निराशा थी। इसके कारण राजपूत सरदारों ने मिलकर महाराणा प्रताप को विक्रम संवत 1628 फाल्गुन शुक्ल 15 यानि 1 मार्च 1576 को मेवाड़ की गद्दी पर बैठाया।

इस घटना के कारण जगमल उसका शत्रु बन गया और अकबर से मिल गया। उदयपुर महाराणा के मेवाड़ की राजधानी थी। उन्होने 1568 से 1597 ई तक शासन किया। यह मानते हुए कि उदयपुर पर यवनों, तुर्कों द्वारा आसानी से हमला किया जा सकता है, और सामंतों की सलाह से, प्रताप ने उदयपुर छोड़ दिया और कुंभलगढ़ और गोगुन्दा के पहाड़ी क्षेत्रों को अपना केंद्र बनाया।

1567 में, मुगल सेना ने मेवाड़ की राजधानी चित्तौड़ पर हमला करने की कोशिश की, लेकिन मुगल सेना से लड़ने के बजाय राणा उदय सिंह ने राजधानी छोड़ दी और अपने परिवार के साथ गोगुंडा चले गए।
हालाँकि महाराणा प्रताप ने निर्णय का विरोध किया और वापस रहने पर जोर दिया,लेकिन बुजुर्ग उन्हें समझाने में सक्षम थे कि जगह छोड़ना सही निर्णय था। उदय सिंह और उनके दरबारियों ने गोगुन्दा में मेवाड़ राज्य की एक अस्थायी सरकार की स्थापना की।

महाराणा प्रताप का भाला (Maharana Pratap Bhala) –

राणा प्रताप शरीर में विशाल और शक्तिशाली थे। इस बात से हम उसके कद का अंदाजा लगा सकते हैं, जब वह युद्ध के मैदान में उतरा, तो उसके भाले का वजन 81 किलो, उसके कवच का 72 किलो, उसकी तलवार, भाले और कवच का कुल वजन 208 किलो था। उनके शरीर का वजन 110 किलो और ऊंचाई साढ़े सात फीट थी। बहुत से लोग इसे महज मनगढ़ंत कहानी कहेंगे, लेकिन अगर वे अभी भी प्रताप के इन सामानों को देखना चाहते हैं, तो वे संग्रह हॉल में सुरक्षित हैं। शत्रु प्रताप से युद्ध में आने से भी कतराते थे क्योंकि कहा जाता है कि प्रताप इतना भयंकर वार करते थे कि दुश्मन को घोड़े समेत दो भागों में चीर डालते थे.

महाराणा प्रताप की मृत्यु – Maharana Pratap Death

स्वाभिमान के धनी और स्वाधीनता के पुजारी राणा प्रताप ने जीवन भर मुगलों की अधीनता स्वीकार नहीं की। उसका राज्य छिन जाने के बावजूद, वह अभाव में जीवन व्यतीत करने में ही सन्तुष्ट थे। लेकिन उन्होंने अपने स्वाभिमान से कभी समझौता नहीं किया। कहा जाता है कि 19 जनवरी, 1597 को चावंड में धनुष की डोरी खींचते समय आंत में गंभीर चोट लगने से उनकी मृत्यु हो गई थी। जब अकबर को प्रताप की मृत्यु की खबर मिली, तो कहा जाता है कि वह फूट-फूट कर रोया। स्वाभाविक रूप से प्रताप जैसे वीर शत्रु सबकी किस्मत में कहाँ होते हैं। साथ ही अकबर द्वारा प्रताप को अपने अधीन करने के सपने को तोड़ने के कारण वह बहुत निराश था।

महाराणा प्रताप पुण्यतिथि (Maharana Pratap Punyatithi)

इंटरनेट पर उपलब्ध सूत्रों में मुख्य रूप से प्रताप की पुण्यतिथि पर दो तारीखें आती हैं, पहली 19 जनवरी और दूसरी 29 जनवरी। आज का दिन धरती के पुत्र महाराणा के कार्यों और उनके स्वाभिमान को लोगों तक पहुंचाने का है। आइए हम अपने बच्चों को प्रताप के जीवन के बारे में बताते हैं। पराक्रमी जिसने अकबर द्वारा भेजे गए 6 प्रस्तावों को अस्वीकार कर दिया और अपनी मातृभूमि के लिए जंगलों में रहना स्वीकार कर लिया।


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महाराणा प्रताप की शौर्यगाथा – Maharana Pratap History

प्रताप के काल में दिल्ली में मुगल सम्राट अकबर का शासन थाए जो भारत के सभी राजा.महाराजाओं को अपने अधीन कर मुगल साम्राज्य की स्थापना कर इस्लामिक परचम को पूरे हिन्दुस्तान में फहराना चाहता था।जगमल क्रोधित होकर बादशाह अकबर के पास गया और बादशाह ने उसे अपनी जागीर में जाहजपुर का इलाका देकर अपने पक्ष में कर लिया। इसके बाद बादशाह ने जगमल को सिरोही के राज्य का आधा हिस्सा दे दिया। इस वजह से जगमल की सिरोही के राजा सुरतन देवड़ा से दुश्मनी हो गई और अंत में जगमल 1583 में युद्ध में मारा गया।

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जिस समय महाराणा प्रताप सिंह ने मेवाड़ की गद्दी संभाली उस समय राजपुताना बेहद नाजुक दौर से गुजर रहा था। बादशाह अकबर की क्रूरता के आगे राजपूताना के कई राजाओं ने सिर झुका लिया। कई वीर साम्राज्यों के उत्तराधिकारियों ने अपनी संपूर्ण गरिमा के सम्मान को भूलकर मुगलिया वंश के साथ वैवाहिक संबंध स्थापित किए थे।

कुछ स्वाभिमानी राजघरानों के साथ-साथ महाराणा प्रताप अपने पूर्वजों की गरिमा की रक्षा के लिए भी अड़े थे और इसलिए वे हमेशा तुर्की सम्राट अकबर की आँखों में ख़टकते थे।अकबर ने मेवाड़ को जीतने के लिए कई प्रयास किए। अकबर ने अजमेर को अपना केंद्र बनाकर प्रताप के खिलाफ एक सैन्य अभियान शुरू किया। महाराणा प्रताप ने कई वर्षों तक मुगलों के सम्राट अकबर की सेना से युद्ध किया। प्रताप की वीरता ऐसी थी कि उसके शत्रु भी उसके युद्ध कौशल के कायल थे।

Maharana Pratap Ki Kahani – महाराणा प्रताप की कहानी

हल्दीघाटी का युद्ध (Haldighati Ka Yuddh) –

हल्दीघाटी का युद्ध भारत के इतिहास की एक प्रमुख घटना है। यह युद्ध 18 जून 1576 को लगभग 4 घंटे तक चला, जिसमें मेवाड़ और मुगलों के बीच भीषण युद्ध हुआ। महाराणा प्रताप की सेना का नेतृत्व एकमात्र मुस्लिम सरदार हकीम खान सूरी ने किया था और मुगल सेना का नेतृत्व मानसिंह और आसफ खान ने किया था। इस युद्ध में महारान प्रताप के कुल 20000 राजपूतों को अकबर की कुल 60000 मुगल सेना का सामना करना पड़ा, जो एक अनोखी बात है।

अपनी विशाल मुगल सेना, बेजोड़ बारूद, युद्ध के नए तरीकों के ज्ञान के साथ सलाहकार, जासूसों की लंबी सूची के बावजूद,छल के बाद भी, जब अकबर महाराणा प्रताप के आगे झुकने में असफल रहा, तो उसने मानसिंह को एक बड़ी सेना के साथ डूंगरपुर और उदयपुर के शासकों को अधीनता स्वीकार करने के लिए मजबूर करने के लक्ष्य के साथ भेजा। मानसिंह की सेना के आगे डूंगरपुर राज्य ज्यादा विरोध नहीं कर सका।इसके बाद मानसिंह महाराणा प्रताप को मनाने उदयपुर पहुंचे। मानसिंह ने उन्हें अकबर की अधीनता स्वीकार करने की सलाह दी, लेकिन प्रताप ने दृढ़ता से अपनी स्वतंत्रता बनाए रखने की घोषणा की और युद्ध में सामना करने की भी घोषणा की।

इस घटना से चिड कर सम्राट अकबर ने मानसिंह और आसफ खान के नेतृत्व में अपनी विशाल मुगल सेना को मेवाड़ पर आक्रमण करने के लिए भेजा। आखिरकार, बुधवार, 30 मई, 1576 को तड़के हल्दीघाटी के खेत में भयंकर युद्ध छिड़ गया।इसमें मुगल, राजपूत और पठान योद्धाओं के साथ जबरदस्त तोपखाने भी थे। शाहजादा सलीम के साथ अकबर के प्रसिद्ध सेनापति महावत खान, आसफ खान, मानसिंह भी उस मुगलवाहिनी का संचालन कर रहे , जिनकी संख्या इतिहासकार 80 हजार से 1 लाख तक बताते हैं। इस युद्ध में प्रताप ने अभूतपूर्व वीरता और साहस से मुगलों को परास्त किया।उन्होने सेना के दांत खट्टे कर दिए और अकबर के सैकड़ों सैनिकों को मार डाला।

विकट स्थिति में झाला सरदार मानसिंह ने महाराणा प्रताप का ताज और छत्र अपने सिर पर ले लिया। मुगलों ने उन्हें प्रताप समझ लिया और वे उनके पीछे दौड़ पड़े। इस प्रकार उसने राणा को युद्ध का मैदान छोड़ने का अवसर दिया। इस असफलता से अकबर बहुत क्रोधित हुआ।उसी समय, अकबर स्वयं विक्रम संवत 1633 में शिकार के बहाने अपने सैन्य बल के साथ इस क्षेत्र में पहुंचा और अचानक महाराणा प्रताप पर हमला कर दिया। दुर्गम परिस्थितियों और सीमित संसाधनों को समझते हुए, प्रताप ने पहाड़ी क्षेत्रों में खुद को स्थापित किया और छोटे और गुरिल्ला युद्ध के माध्यम से दुश्मन सेना को हतोत्साहित किया।

स्थिति को भांपते हुए, सम्राट ने मैदान छोड़ना बुद्धिमानी समझा।इस बार के युद्ध में महाराणा प्रताप ने अपने धर्म का परिचय दिया और युद्ध में जब शाही सेनापति मिर्जा खान के सैन्य बल ने आत्मसमर्पण कर दिया, तो शाही महिलाएं भी उनके साथ थीं। महाराणा प्रताप ने उन सभी के सम्मान को सुरक्षित रखते हुए आदरपूर्वक इसे मिर्जा खान के पास भेज दिया।सलीम ने अपनी सेना को एकत्रित कर फिर से महाराणा प्रताप पर आक्रमण किया और इस बार भयंकर युद्ध हुआ।

इस युद्ध में महाराणा प्रताप का प्रिय घोड़ा चेतक घायल हो गया था।चेतक महाराणा प्रताप का सबसे प्रिय और प्रसिद्ध घोड़ा था। हल्दीघाटी के युद्ध में अपनी जान गंवाकरउसने बुद्धि, निडरता, भक्ति और वीरता का परिचय दिया। चेतक की कहानी भी बहुत यादगार है, जिसमें मुगलों को वापस आते देख महाराणा प्रताप की रक्षा के लिए बरसाती नाले को पार करते हुए उसने शहादत प्राप्त की थी।

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महाराणा प्रताप का वनवास (Mahaaraana Prataap Ka Vanavaas) –

राजपूतों ने बहादुरी के साथ मुगलों का मुकाबला किया, परंतु शत्रु की विशाल सेना के सामने समूचा पराक्रम निष्फल रहा। युद्धभूमि पर उपस्थित 22 हजार राजपूत सैनिकों में से केवल 8 हजार जीवित सैनिक युद्धभूमि से किसी प्रकार बचकर निकल पाए। महाराणा प्रताप को जंगल में आश्रय लेना पड़ा।

महाराणा प्रताप चित्तौड़ छोड़कर जंगलों में रहने लगे। महारानी, सुकुमार राजकुमारी और कुमार घास की रोटियों और जंगल के पोखरों के जल पर ही किसी प्रकार जीवन व्यतीत करने को बाध्य हुए। अरावली की गुफाएं ही अब उनका आवास और शैया थी। महाराणा प्रताप को अब अपने परिवार और बच्चों की चिंता सताने लगी थी।

मुगल चाहते थे कि महाराणा प्रताप किसी भी तरह अकबर की अधीनता स्वीकार कर ‘दीन-ए-इलाही’ धर्म अपना लें। इसके लिए उन्होंने महाराणा प्रताप तक कई प्रलोभन संदेश भी भिजवाए, लेकिन महाराणा प्रताप अपने निश्चय पर अडिग रहे।

कई छोटे राजाओं ने महाराणा प्रताप से अपने राज्य में रहने की गुजारिश की लेकिन मेवाड़ की भूमि को मुगल आधिपत्य से बचाने के लिए महाराणा प्रताप ने प्रतिज्ञा की थी कि जब तक मेवाड़ आजाद नहीं होगा, वे महलों को छोड़ जंगलों में निवास करेंगे।

स्वादिष्ट भोजन को त्याग कंद-मूल और फलों से ही पेट भरेंगे, लेकिन अकबर का आधिपत्य कभी स्वीकार नहीं करेंगे। जंगल में रहकर ही महाराणा प्रताप ने भीलों की शक्ति को पहचानकर छापामार युद्ध पद्धति से अनेक बार मुगल सेना को कठिनाइयों में डाला था। प्रताप साधन सीमित होने पर भी दुश्मन के सामने सिर नहीं झुकाया।

महाराणा प्रताप की सफलता (Maharana Pratap ki Saphalata) –

1579 से 1585 तक पूर्वी उत्तर प्रदेश, बंगाल,बिहार और गुजरात के मुग़ल अधिकृत प्रदेशों में विद्रोह होने लगे थे और महाराणा भी एक के बाद एक गढ़ जीतते जा रहे थे अतः परिणामस्वरूप अकबर उस विद्रोह को दबाने में उल्झा रहा और मेवाड़ पर से मुगलो का दबाव कम हो गया। इस बात का लाभ उठाकर महाराणा ने 1585ई, में मेवाड़ मुक्ति प्रयत्नों को और भी तेज कर दिया। महाराणा जी की सेना ने मुगल चौकियों पर आक्रमण शुरू कर दिए और तुरन्त ही उदयपूर समेत 36 महत्वपूर्ण स्थान पर फिर से महाराणा का अधिकार स्थापित हो गया।

बारह वर्ष के संघर्ष के बाद भी अकबर उसमें कोई परिवर्तन न कर सका। और इस तरह महाराणा प्रताप समय की लम्बी अवधि के संघर्ष के बाद मेवाड़ को मुक्त करने में सफल रहे और ये समय मेवाड़ के लिए एक स्वर्ण युग साबित हुआ। मेवाड़ पर लगा हुआ अकबर ग्रहण का अन्त 1585 ई में हुआ। उसके बाद महाराणा प्रताप उनके राज्य की सुख.सुविधा में जुट गएए परन्तु दुर्भाग्य से उसके ग्यारह वर्ष के बाद ही 19 जनवरी 1597 में अपनी नई राजधानी चावण्ड में उनकी मृत्यु हो गई।

29 जनवरी 1597, 56 वर्ष की उम्र में अपनी नई राजधानी चावंड,राजस्थान मे उनकी मृत्यु हो गई। उनकी मृत्यु मुग़ल सल्तनत के खिलाफ युद्ध लड़ कर हुए घावों और चोटों के कारण हुई।

महाराणा प्रताप का देहावसान (Death Of Maharana Pratap) –

महाराणा प्रताप की मृत्यु पर अकबर को बहुत ही दुःख हुआ क्योंकि ह्रदय से वो महाराणा प्रताप के गुणों का प्रशंसक था और अकबर जनता था की महाराणा प्रताप जैसा वीर और कोई नहीं है इस धरती पर। यह समाचार सुन अकबर रहस्यमय तरीके से मौन हो गया और उसकी आँख में आँसू आ गए।

प्रताप का सिर कभी नहीं झुका,
इस बात से अकबर भी शर्मिंदा था,
मुगल कभी चैन से सो न सके
जब तक मेवाड़ी राणा जिन्दा था।

(Source: Nishant Expression)

Final Words On Maharana Pratap History In Hindi

महाराणा प्रताप जैसा वीर हमारे इतिहास शायद ही कोई हुआ होगा। वो एक प्रतापी राजा थे जिन्होने अपनी मात्रभूमि के सम्मान के लिए अपना सब कुछ न्योछावर कर दिया। 30 साल के संघर्ष और युद्ध के बाद भी अकबर न तो महाराणा प्रताप को बंदी बना सका और न ही झुका सका। महान वह है जो अपने देश, धर्म और संस्कृति की रक्षा के लिए किसी भी तरह से समझौता नहीं करता और निरंतर संघर्ष करता रहता है। ऐसे लोग हमेशा लोगों के दिलों में जिंदा रहते हैं।

तो दोस्तों ये थी maharana pratap history in hindi आपको ये जानकारी कैसी लगी हमको कॉमेंट करके ज़रूर बतायें। पोस्ट अच्छी लगी हो तो लाइक करना ना भूलें। हमारी पोस्ट पढ़ने के लिए बहुत बहुत धन्यवाद दोस्तों।

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