दुर्गा पूजा पर निबंध | 13+ Durga Puja Essay (2022)

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नमस्कार दोस्तों, हमारी आज की पोस्ट durga puja essay में हम आपके लिये लाये हैं, दुर्गा पूजा पर निबंध। दुर्गा पूजा हिंदुओं के महत्वपूर्ण त्यौहारों में से एक है। यह उत्सव 10 दिनों तक चलता है, लेकिन माँ दुर्गा की मूर्ति की पूजा 7 वें दिन से शुरू की जाती है।

दुर्गा पूजा में, लोग नौ दिन तक माँ की पूजा करतें हैं और सुख-समृद्दि का आशीर्वाद प्राप्त करतें हैं। आप हमारे इन निबंधो को स्कूल या कॉलेज में निबंध प्रतियोगिता में लिख सकतें है और सोशल मीडिया पर शेयर कर सकते हैं।

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दुर्गा पूजा पर निबंध Durga puja essay-

सर्वमंगल मांगल्ये शिवे सर्वार्थ साधिके।
शरण्ये त्र्यंबके गौरी नारायणि नमोऽस्तुते।

मां दुर्गा शक्ति का प्रतीक है इसलिए सभी उनके आगे नतमस्तक होकर उन्हें प्रणाम करते है। दुर्गा पूजा का त्यौहार हिंदू धर्म को मानने वाले लोगों के लिए एक महत्वपूर्ण त्यौहार है इस त्यौहार को नवरात्रि के नाम से भी जाना जाता है। इस त्यौहार का आयोजन दस दिनों तक किया जाता है।

दुर्गा पूजा महोत्सव इस्त्री के सम्मान को भी दर्शाता है। यह त्यौहार भारतीयों द्वारा बहुत उत्साह और प्रेम के साथ मनाया जाता है। इस समय, सभी घरों में खुशी और बाजारों में अलग ही रौनक देखने को मिलती है।

दुर्गा पूजा का महत्व –

दुर्गा पूजा के दिन माँ दुर्गा की पूजा करने से सुख समृद्धि यश कीर्ति और आरोग्यता प्राप्त होती है। आज के दिन माँ दुर्गा की पूजा करने से सभी संकट दूर हो जातें हैं। यह पवन तिथि कल्याणकारी व दुखों का नाश करने वाली है।

दुर्गा पूजा का कारण –

देवी दुर्गा की पूजा की जाती है क्योंकि, माँ दुर्गा ने 10 दिनों और रातों के युद्ध के बाद महिषासुर नामक राक्षस को मारा था। देवी दुर्गा के पास दस हाथ थे और सभी हाथों में कई हथियार भी थे। माँ दुर्गा के कारण सभी लोगों को राक्षस महिषासुर से मुक्ति मिली थी। जिसकी वजह से सभी लोग पूरी श्रद्धा के साथ मा दुर्गा की पूजा करतें है।

दुर्गा पूजा का त्योहार कैसे मनाया जाता है-

उन जगहों में विशेष तैयारियां की जाती है, जहां पर दुर्गा पूजा का पंडाल लगाया जाता है। दुर्गा पूजा के पंडाल की तैयारी और दुर्गा मां की मूर्तियों की तैयारी भी बहुत दिनों पहले से ही शुरू की जाती है।

आजकल दुर्गा पूजा के पंडालों को ऐसे भी डिजाइन किया जाता है ताकि इस पंडाल के द्वारा समाज में एक अच्छा विचार पेश कर सकें। अभी दुर्गा पूजा में अलग-अलग सामाजिक विचार धाराओं के आधारित पर पंडाल बनाया जाता है। जैसे कि पर्यावरण को कैसे प्रदूषण से बचाएं नारी शक्ति समाज में नहीं आए।

दुर्गा पूजा 9 दिनों तक मनाया जाता है पहले दिन कलश स्थापना की जाती है, और उसी दिन से दुर्गा मां की पूजा शुरू हो जाती है, हर एक दिन दुर्गा मां के अलग-अलग रूपों की पूजा की जाती है।

लोग इस पावन पूजा में 9 दिनों तक उपवास करते हैं। अगले दिन विजयदशमी के दिन दुर्गा मां की मूर्ति को तालाब, नदी में विसर्जन किया जाता है।

दुर्गा मां का विसर्जन को बहुत ही धूमधाम के साथ किया जाता है। दुर्गा पूजा बहुत ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है। दुर्गा पूजा हमारे देश का बहुत ही महत्वपूर्ण और मुख्य त्योहार में से एक है और आज इसे हर धर्म के लोग मनाते हैं।

दुर्गा पूजा की कहानी-

यह माना जाता है कि एक बार महिषासुर नामक एक राजा था। महिषासुर ने स्वर्ग में देवताओं पर आक्रमण किया था। महिषासुर बहुत ही शक्तिशाली था, जिसके कारण उसे कोई भी हरा नहीं सकता था। उस समय ब्रह्मा, विष्णु और शिव भगवान के द्वारा एक आंतरिक शक्ति का निर्माण किया गया, जिनका नाम दुर्गा रखा गया था।

देवी दुर्गा को महिषासुर का विनाश करने के लिए आंतरिक शक्ति प्रदान की गई थी। देवी दुर्गा ने महिषासुर के साथ पूरे नौ दिन युद्ध किया था और अंत में दसवें दिन महिषासुर को मार डाला था। दसवें दिन को दशहरा या विजयदशमी के रूप में कहा जाता है।

रामायण के अनुसार भगवान श्री राम ने रावण को मारने के लिए देवी दुर्गा से आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए चंडी पूजा की थी। श्री राम ने दुर्गा पूजा के दसवें दिन रावण को मारा था और तभी से उस दिन को विजयदशमी कहा जाता है। इसीलिए देवी दुर्गा की पूजा हमेशा अच्छाई की बुराई पर विजय का प्रतीक है।

दुर्गा पूजा का आयोजन:

माँ दुर्गा महोत्सव दस दिनों तक बड़े उत्साह, उमंग और सम्मान के साथ आयोजित किया जाता है। हिन्दू पंचांग के अनुसार अश्विन शुक्ल सप्तमी से दशमी (विजयादशमी) तक इस पर्व का आयोजन किया जाता है।

पहले दिन मां दुर्गा की मूर्ति को विराजमान करतें है। और फिर नौ दिनों तक मां के विभिन्न रूपों की पूजा करतें है। शाम को आरती के बाद उत्सव को और दिलचस्प बनाने के लिए डांडिया नृत्य और भजन नृत्य जैसी विभिन्न प्रतियोगिताएं आयोजित की जाती हैं।

मां के पूरे पंडाल को तरह-तरह के फूलों और जगमगाती लाइटों से सजाया जाता है। यह नज़ारा देखने में बहुत ही सुंदर लगता है। इस त्योहार में महिलाओं और पुरुषों को मां का मन जीतने के लिए नौ दिनों तक उपवास करना पड़ता है।

दुर्गा मां का यह त्योहार विशेष रूप से गुजरात, बंगाल, ओडिशा, असम और बिहार में मनाया जाता है, लेकिन अब वर्तमान समय में यह त्योहार हर जगह प्रमुख रूप से मनाया जाने लगा है।

यह त्योहार नवरात्र के अंतिम तीन दिनों में अपने चरम पर होता है। सप्तमी अष्टमी और नवमी में लोग अपनी मां की विशेष तरीके से पूजा करते है, और कुछ जगहों पर बड़े मेलों का आयोजन किया जाता है। उत्तर भारत में नवमी त्योहार पर, लड़कियों को देवी दुर्गा की पूजा करने के बाद भोजन करवाया जाता है।

माना जाता है कि उस दिन मां दुर्गा कन्या के रूप में रात्रि भोज के लिए घर-घर आती है। बांग्लादेश में लोग इस त्यौहार को बड़ी ही उत्सुकता से मनाते हैं। इसके उपलक्ष पर विवाहित पुत्रियों को माता-पिता द्वारा घर बुलाने की प्रथा है।

मूर्ति विसर्जन-

नवमी की रात को मा के पंडाल में भजन संध्या का आयोजन किया जाता है, जिसमें सभी श्रद्धालु श्रद्धा के साथ भाग लेते है और रात भर मां दुर्गा का भजन गाते है। दशमी के दिन मां दुर्गा की पूजा के बाद, दुर्गा मां की मूर्तियों को रंग-बिरंगे फूलों से सजाया जाता है, और पूरे शहर और कस्बों में झांकियां निकाली जाती हैं।

बाद में मां दुर्गा की मूर्तियों को पवित्र जल निकायों, तालाबों या नदियों में विसर्जित कर दिया जाता है। जिस समय मां का विसर्जन किया जाता है, सभी लोग उनका आशीर्वाद लेते हैं। और समृद्धि और सुख की प्रार्थना करतें है। उसके बाद सभी अपने-अपने घरों को लौट जाते हैं।

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दुर्गा पूजा पर दूसरा निबंध –

उन लोगों के मुताबिक जो हिंदू धर्म को मानते हैं, मां भगवती संपूर्ण संसार की शक्ति की स्त्रोत हैं। इन्हीं की शक्तियों से धरती पर कार्य सम्पन होते हैं। भगवती को खुश करने के लिए, नवरात्रि महोत्सव साल में दो बार आता है, एक चैत्र माह में दूसरा आश्विन माह में।

अश्विन महीने के नवरात्रि के दौरान, भगवान राम की पूजा और रामलीला मनमोहक होती है। अश्विन मास की नवरात्रि को शारदीय नवरात्र भी कहते हैं।

पूजन विधि और घट स्थापना-

▪ नवरात्रि के पहले दिन स्नान करके माता, गुरुदेव व इष्ट देव को नमन करते हैं।
▪ इसके बाद गणेश जी का आहवान करते हैं।
▪ इसके बाद आम के पत्ते और पानी कलश में डाला जाता है।
▪ कलश पर नारियल को लाल वस्त्र में बांध कर रखें।
▪ उसमें एक बादाम, दो सुपारी एक सिक्का जरूर डालें।
▪ इसके बाद,मां सरस्वती, मां लक्ष्मी और मां दुर्गा का ध्यान करें।
▪ दीपक व धूप बत्ती को जलाकर मा के सभी रूपों की पूजा करें।
▪ नवरात्र के खत्म होने पर कलश के जल का छींटा घर में मारें
▪ और कन्या पूजन के बाद प्रसाद वितरण करें।

दुर्गा पूजा का उत्सव-

पूजा शुरू होने से लगभग दो महीने पहले से ही तैयारियां शुरू हो जाती हैं। तीन से चार महीने पहले से ही मूर्तिकार मूर्तियाँ बनाना शुरू कर देते हैं। देवी दुर्गा की मूर्ति में उनके साथ दस हाथ और उनका वाहन सिंह होता है।

असुरों और पापियों का नाश करने के लिए माँ दुर्गा दस तरह के हथियार रखती हैं। देवी दुर्गा के पास लक्ष्मी, सरस्वती, कार्तिकेय और गणेश जी की मूर्तियाँ भी स्थापित की जाती हैं। दुर्गा पूजा के उत्सव को बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में मनाया जाता है।

मूर्ति का विसर्जन-

पूजा के बाद लोग पवित्र जल में देवी दुर्गा जी की मूर्ति के विसर्जन के समारोह का आयोजन करते हैं। भक्त अपने घर उदास चेहरों के साथ लौटते हैं | और माता से फिर से अगले साल बहुत से आशीर्वाद के साथ आने के लिए प्रार्थना करते हैं।

दुर्गा पूजा के प्रभाव-

लोगों की लापरवाही के कारण यह पर्यावरण पर बड़े स्तर पर प्रभाव डालता है। देवी दुर्गा की प्रतिमा को बनाने और रंगने में जिन पदार्थों का प्रयोग किया जाता है वे स्थानीय पानी के स्त्रोतों में प्रदुषण का कारण बनते हैं।

इस त्यौहार से पर्यावरण के प्रभाव को कम करने के लिए सभी को प्रयत्न करने चाहिएँ। भक्तों को सीधे ही मूर्ति को पवित्र गंगा के जल में विसर्जित नहीं करना चाहिए और इस परंपरा को निभाने के लिए कोई अन्य सुरक्षित तरीका निकालना चाहिए।

माँ दुर्गा के 9 स्वरूप-

प्रथम दिन- शैलपुत्री
नवरात्रि के पहले दिन माँ दुर्गा के पहले अवतार देवी शैलपुत्री की पूजा की जाती हैं।
जिन्हे माता पार्वती के नाम से भी जाना जाता हैं और देवी शैलपुत्री को पहाड़ों की पुत्री भी कहा जाता हैं । देवी शैलपुत्री का वाहन बैल हैं।

द्वितीय दिन -ब्रह्मचारिणी
नवरात्रि के दूसरे दिन माँ ब्रह्मचारिणी की पूजा की जाती हैं संस्कृत में ब्रह्म शब्द का अर्थ तपस्या होता हैं। इस स्वरुप की पूजा अर्चना करके हम माँ दुर्गा के अनंत स्वरुप को जानने के बारे में जानने का प्रयास करते हैं।

तृतीय दिन -चंद्रघंटा
नवरात्रि के तीसरे दिन माँ चंद्रघंटा की पूजा की जाती हैं।
माँ चंद्रघंटा का स्वरुप चन्द्रमा की तरह होने के कारण इनको चंद्रघंटा नाम दिया गया हैं।

चंद्रघंटा स्वरूप में माँ दुर्गा की 10 भुजाएं और माथे पर आधा चन्द्रमा भी हैं। इस दिन माँ चंद्रघंटा की पूजा करने से नकारात्मक शक्तियों से से लड़ने का साहस मिलता हैं।

चतुर्थ दिन – कूष्माण्डा
कूष्माण्डा माँ दुर्गा का चौथा अवतार हैं द्यमाँ दुर्गा के इस रूप को सृष्टि का जनक भी माना जाता हैं। माँ कूष्माण्डा की पूजा आराधना करने से हमें अपने आप को उन्नत करने और अपने मस्तिष्क की सोचने की शक्ति को शिखर पर ले जाने में में मदद मिलती है।

पंचम दिन -स्कंदमाता
नवरात्रि के पांचवे दिन माँ दुर्गा के पांचवे स्वरूप माँ स्कंदमाता की पूजा की जाती हैं।
स्कंदमाता को भगवान कार्तिकेय की माता के रूप में भी जाना जाता हैं।

स्कंदमाता की पूजा अर्चना करने से हमारे भीतर के व्यावहारिक ज्ञान को बढ़ाने का आशीर्वाद प्राप्त होता है। जिससे हम व्यावहारिक चीजों से निपटने में सक्षम होते हैं।

षष्ठम दिन – कात्यायनी
माँ दुर्गा के छटवां स्वरुप माँ कात्यायनी का हैं, इनका नाम कात्यायनी इस लिए पड़ा, क्योंकि इन्होने कात्यान ऋषि के घर उनकी पुत्री के रूप में जन्म लिया था।
माँ कात्यायनी की पूजा करने से हमारे अंदर मौजूद नकारात्मक शक्तियां ख़त्म हो जाती हैं।

सप्तम दिन -कालरात्रि
नवरात्रि के सातवें दिन माँ कालरात्रि की पूजा की जाती हैं। माँ कालरात्रि का यह रूप बेहद ही विशाल और भयंकर हैं। माँ कालरात्रि को काल का नाश करने वाली देवी के रूप में जाना जाता हैं।

माँ कालरात्रि का वाहन गधा हैं। इस दिन माँ काल रात्रि की पूजा करने से यश, और वैभव की प्राप्ति होती हैं।

अष्टम दिन-महागौरी
नवरात्रि का आठवां दिन माँ महागौरी के दिन के रूप में मनाया जाता हैं।
पौराणिक कथाओं के अनुसार ऐसा कहा जाता है कि शंकर भगवान के लिए कठोर तप करने के कारण इनका शरीर काला हो गया था।

जिसे शिव भगवान ने प्रसन्न होकर गंगा जल से धोया था और इनका शरीर गौर वर्ण का हो गया था और इसी कारण इन्हें महागौरी के नाम से जाना जाता है।

नवम दिन-सिद्धिदात्री
माँ दुर्गा का नवां और अंतिम स्वरुप माँ सिद्धिदात्री के दिन के रूप में मनाया जाता हैं।
माँ सिद्धिदात्री की पूजा आराधना करने से हमारे अंदर एक ऐसी क्षमता उत्पन्न होती है। जिससे हम अपने सभी कार्यों को आसानी से कर सकें और उनको पूर्ण कर सकें।

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दुर्गा पूजा पर तीसरा निबंध –

यह पूजा 9 दिनों तक चलती है। दुर्गा पूजा को नवरात्रि भी कहा जाता है। नवदुर्गा हिंदू पंथ में माता दुर्गा के नौ रूपों को एक साथ कहा जाता है। इन नौ देवियों को पाप विनाशिनी कहा जाता है।

हर देवी के अलग अलग वाहन हैं, अस्त्र-शस्त्र हैं, परन्तु यह सब एक हैं। दुर्गा सप्त्सती ग्रन्थ के अन्तर्गत देवी कवच स्तोत्र में निम्नांकित श्लोक में नवदुर्गा के नाम क्रमश: दिये गए हैं-

प्रथमं शैलपुत्री च द्वितीयं ब्रह्मचारिणी।
तृतीयं चन्द्रघण्टेति कूष्माण्डेति चतुर्थकम् ।।
पंचमं स्कन्दमातेति षष्ठं कात्यायनीति च।
सप्तमं कालरात्रीति महागौरीति चाष्टमम् ।।
नवमं सिद्धिदात्री च नवदुर्गारू प्रकीर्तितारू।
उक्तान्येतानि नामानि ब्रह्मणैव महात्मना ।।

दुर्गा माँ शक्ति की प्रतीक हैं, दुर्गा पूजा के दिन सभी लोग माँ दुर्गा की पूजा करतें है, और माँ दुर्गा से अपने परिवार की सुख और शांति के लिया प्रार्थना करतें हैं

दुर्गा मां के नौ स्वरूपों के नाम –

1. शैलपुत्री2. ब्रह्मचारिणी3. चन्द्रघण्टा
4. कूष्माण्डा5. स्कंदमाता6. कात्यायनी
7. कालरात्रि8. महागौरी9. सिद्धिदात्री

दुर्गा पूजा क्यों मनाई जाती है-

दुर्गा पूजा मनाने के संदर्भ में हमारे हिंदू पौराणिक कथाओं में बहुत सी कहानियां प्रचलित हैं उनमें से 2 कहानियां बहुत ही प्रचलित है।

पहली कहानी- राक्षसों के राजा महिषासुर ने पूरे मानव जाति पर अत्याचार करने लगे और फिर स्वर्ग में भी जाकर बहुत ही अपनी बुराइयों पर अत्याचार करने लगे। तब सभी भगवानों ने मानव कल्याण और लोगों को महिषासुर का अत्याचार से बचाने के लिए विचार करने लगे।तब देवी सती ने महिषासुर का वध करने का निर्णय लिया |

दुर्गा की मां ने महिषासुर के साथ 9 दिनों के लिए युद्ध जारी रखा और आखिरी दिन दुर्गा मा ने महिषासुर का वध किया । देवी दुर्गा ने महिषासुर का वध किया और मानव जाति को उसके अत्याचार से मुक्त कराया। तब से देवता गन और मानव ने दुर्गा देवी की पूजा करना शुरू कर दिया।

दूसरी कहानी भगवान श्रीराम से जुड़ी है,जब श्रीराम माता सीता को रावण की कैद से छुड़ाने के लिए लंका गये थे | तब उन्होने रावण से युध में विजयी होने के लिए मा दुर्गा की पूजा की, मा दुर्गा ने श्री राम को जीत का आशीर्वाद दिया और शक्ति प्रदान की।

भगवान श्री राम और रावण के बीच भी 9 दिनों तक युद्ध चला। दसवे दिन भगवान श्री राम ने रावण का वध किया और सीता मां को रावण के कैद से छुड़ाया और उसी दिन से दशहरा पर्व मनाया जाने लगा।

दुर्गा पूजा का इतिहास History of Durga Puja –

मां दुर्गा को हिमालय और मानेका की बेटी माना जाता है, ऐसा माना जाता है कि भगवान भोलेनाथ की पत्नी “सती” के आत्मनिर्णय के बाद, मां दुर्गा के अवतार का जन्म हुआ था। उन्हें सती का दूसरा रूप कहा जाता है। दुर्गा पूजा से संबंधित कथाओं के अनुसार मां सती ने उन्हें दुर्गा का अवतार इसलिए कहा था।

क्योंकि उस समय, महिषासुर नाम के असुर ने देवलोक और पृथ्वीलोक पर हाहाकार मचा रखा था। मां दुर्गा और महिषासुर के बीच 10 दीनो तक घमासान युद्ध हुआ और दसवें दिन मां दुर्गा ने महिषासुर का वध कर किया।

तत्पश्चात आज से ही, मां दुर्गा महोत्सव मनाया जाने लगा। मां दुर्गा ने महिषासुर से 10 दीनो तक घमासान युद्ध किया था। इसलिए इस त्यौहार के आयोजन में 9 दीनो तक मां दुर्गा के अलग अलग रूपो की पूजा की जाती है, जिसे हम नवरात्रि कहतें है | और दसवें दिन मा दुर्गा की प्रतिमा का विसर्जन किया जाता है।

मान्यताओं के अनुसार, कुछ राज्यों में मां दुर्गा की प्रतिमा को भगवान शंकर और दो बेटियों लक्ष्मी और सरस्वती के साथ दिखाया जाता है, तो किसी किसी राज्य में मां दुर्गा की प्रतिमा को 2 बच्चों गणेश और कार्तिकेय के साथ दिखाया जाता है।

मां दुर्गा की विशाल प्रतिमा एक विशेष तेज़ के साथ बहुत सुंदर दिखती है। यह दिखाया गया है कि यह उनके दस हाथों में विभिन्न प्रकार के अस्त्र-शस्त्र हैं। मा दुर्गा का वाहन शेर होता है | इसलिए उनकी प्रतिमा का एक पैर सिह पर होता है, और दूसरा महिषासुर की छाती पर होता है।

मां दुर्गा रंग-बिरंगे फूलों की माला गले में सजाए हुए हैं। मा दुर्गा के सर पर सोने का मुकुट लगाया जाता है , मा की प्रतिमा के उपर लाल चुनरी ओढाई जाती है।

दुर्गा पूजा का पर्यावरण पर प्रभाव-

लोगों की लापरवाही के कारण, यह पर्यावरण पर बड़े स्तर पर प्रभाव डालता है। माता दुर्गा की मूर्ति को बनाने और रंगने में प्रयोग किए गए पदार्थ (जैसे सीमेंट, पेरिस का प्लास्टर, प्लास्टिक, विषाक्त पेंट्स, आदि) स्थानीय पानी के स्रोतों में प्रदूषण का कारण बनते हैं।

(Source : shashwat creation)

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