Dhanteras 2022 में कब है ? जानिए तारीख,पूजा विधि एवं शुभ मुहूर्त

नमस्कार दोस्तों आज की इस पोस्ट dhanteras 2022 हम लेकर धनतेरस के बारे में पूरी जानकारी दोस्तों। धनतेरस महोत्सव, जिसे धनत्रयोदशी या धन्वंतरि त्रयोदसी के नाम से भी जाना जाता है, हिंदू महीने कार्तिक (अक्टूबर / नवंबर) में कृष्ण पक्ष के शुभ तेरहवें चंद्र दिवस पर पड़ता है। धनतेरस के दिन देवी लक्ष्मी की पूजा सुख-समृद्धि प्रदान करने के लिए की जाती है। इसलिए धनतेरस का व्यापारिक समुदाय के लिए बहुत महत्व है।

धनतेरस का त्योहार पूरे भारत में पांच दिवसीय दिवाली समारोह के रूप में मनाया जाता है। धनतेरस ‘धन’ शब्द का एक रूप है, जिसका अर्थ है धन और ‘तेरस’ का अर्थ तेरहवां है, इसलिए यह एक हिंदू त्योहार है जो कार्तिक (अक्टूबर-नवंबर) के महीने में कृष्ण पक्ष के तेरहवें चंद्रमा के दिन मनाया जाता है।यह दिवाली से ठीक दो दिन पहले मनाया जाता है, जिसमें लोग भगवान से समृद्धि और अच्छे स्वास्थ्य की प्रार्थना करते हैं। धनतेरस को ‘धनत्रियोदशी’ और ‘धन्वंतरि त्रयोदशी’ भी कहा जाता है।

dhanteras 2021

धनतेरस कब है (When is Dhanteras 2022) –

साल2021
तारीख2 नवंबर
महुर्तशाम 6 बजकर 18 मिनट से 8 बजकर 11 मिनट तक
दिनमंगलवार

धनतेरस का महत्व (Importance of Dhanteras) –

हिंदू धर्म के इस पर्व पर देवी लक्ष्मी और भगवान धन्वंतरि की पूजा की जाती है। मान्यता है कि इस दिन पूजा करने से घर में धन की कमी नहीं होती है। इस दिन घर के मुख्य द्वार पर दीपक जलाए जाते हैं।आज के दिन विशेष रूप से कुछ खरीदने की परंपरा है। व्यक्ति अपनी क्षमता के अनुसार कुछ खरीदता है। कुछ लोग सोने, चांदी, तांबे, पीतल आदि के बर्तन भी खरीदते हैं। क्योंकि इस दिन बर्तन और आभूषण खरीदना बहुत शुभ माना जाता है। यह पर्व पूरे भारतवर्ष में बड़े ही हर्षोल्लास के साथ मनाया जाता है।

कैसे मनाया जाता है धनतेरस (How is Dhanteras celebrated) –

धनतेरस का पर्व बहुत ही उत्साह और उल्लास के साथ मनाया जाता है। इस त्योहार पर, लोग भगवान यम से अच्छे स्वास्थ्य और देवी लक्ष्मी से समृद्धि के रूप में आशीर्वाद प्राप्त करने के लिए, धन की देवी लक्ष्मी और मृत्यु के देवता यम की पूजा करते हैं। लोग अपने घरों और कार्यालयों को सजाते हैं।

परंपरागत रूप से, लोग अपने घर के आंगन के प्रवेश द्वार को सजाने के लिए रंग-बिरंगी रंगोली बनाकर सजाते हैं। चावल के आटे और सिंदूर से लक्ष्मी जी के छोटे पैरों के निशान बनाए जाते हैं जो देवी लक्ष्मी के लंबे समय से प्रतीक्षित आगमन का प्रतीक हैं।

धनतेरस पर सोने या चांदी जैसी कीमती धातुओं से बने नए बर्तन या सिक्के खरीदना बहुत लोकप्रिय है क्योंकि इसे शुभ माना जाता है और यह हमारे परिवार में सुख, समृद्धि और सौभाग्य लाता है।

▪ धनतेरस कोट्स & स्टेटस हिंदी में 

धनतेरस पूजा विधि (Dhanteras worship method) –

♣ सबसे पहले गणेश जी को लाल रंग का कपड़ा और पुष्प अर्पित करें।
♣ अब चौकी पर लाल रंग का कपड़ा बिछा दें।
♣ अब भगवान धन्वंतरि, माता लक्ष्मी और कुबेर की मूर्ति को गंगाजल छिड़क कर स्थापित करें।
♣ भगवान के सामने देसी घी का दीपक, अगरबत्ती जलाएं।
♣ अब देवताओं को लाल फूल चढ़ाएं।
♣ इस दिन आपने जो भी धातु, बर्तन या आभूषण खरीदा है, उसे चौकी पर रखें।
♣ लक्ष्मी स्तोत्र, लक्ष्मी चालीसा, लक्ष्मी यंत्र, कुबेर यंत्र और कुबेर स्तोत्र का पाठ करें।
♣ धनतेरस की पूजा के दौरान लक्ष्मी माता के मंत्रों का जाप करें और मिठाई भी चढ़ाएं।

धनतेरस पर बर्तन खरीदने की परंपरा (Tradition of buying utensils on Dhanteras) –

भगवान धन्वंतरि का जन्म कार्तिक कृष्ण पक्ष की त्रयोदशी तिथि के दिन हुआ था, इसलिए इस तिथि को धन त्रयोदशी या धनतेरस के नाम से जाना जाता है। दरअसल इसी दिन सागर मंथन से भगवान धन्‍वंतरि उत्पन्न हुए थे। भगवान धन्‍वंतरि के उत्पन्न होने से ठीक दो दिनों के बाद देवी लक्ष्मी सागर मंथन से प्रकट हुईं। जब भगवान आए थे तो उनके हाथ में कलश था, इसलिए धनतेरस के दिन बर्तन खरीदने की परंपरा है।

भगवान धन्वंतरि के हाथों में कलश धारण करने के कारण इस दिन बर्तन खरीदने की परंपरा है। धनतेरस के दिन विशेष रूप से पीतल और चांदी के बर्तन खरीदने चाहिए। इससे घर में स्वास्थ्य, सौभाग्य और स्वास्थ्य लाभ समेत कई फायदे होते हैं। धनतेरस के दिन कुबेर और धन के देवता यमदेव की पूजा का विशेष महत्व है। इस दिन को धन्वंतरि जयंती के नाम से भी जाना जाता है।

धनतेरस की कथा (Dhanteras stories) –

प्रथम कथा (first story)

क्षीरसागर में माता लक्ष्मी के साथ निवास करने वाले श्री हरि के मन में यह विचार आया कि एक बार चलकर मृत्युलोक को देख लो। मां लक्ष्मी भी अपने साथ आने के लिए कहने लगीं। भगवान विष्णु ने उनसे कहा, ‘आप मेरे साथ एक ही शर्त पर आ सकते हैं, आपको मेरी बात माननी होगी और मेरी सभी बातों का पालन करना होगा।’ पृथ्वी पर पहुंचने के कुछ समय बाद भगवान विष्णु ने मां लक्ष्मी को एक स्थान पर रोक दिया और कहा, तुम मेरे वापस आने तक यहीं रुको। यह कहकर विष्णु दक्षिण की ओर चले गए। लक्ष्मीजी ने उसकी एक नहीं सुनी और वह भी उसके पीछे हो ली।

कुछ दूर चलने के बाद उन्हें सरसों का एक खेत दिखाई दिया। खेत में पीली सरसों के सुंदर फूल देख लक्ष्मीजी बहुत प्रसन्न हुए। उन्होने खुद को इन सरसों के फूलों से सजाया और फिर चली गई। आगे बढ़ने पर उसे अब गन्ने का एक खेत मिला। तैयार गन्ने को देखकर मां लक्ष्मी नहीं रुकी और फिर वह गन्ने के खेत में रुक गई और गन्ना चूसने लगी।

उनकी आज्ञा का उल्लंघन देखकर भगवान विष्णु को माता लक्ष्मी पर क्रोध आ गया। उन्होंने मां लक्ष्मी को श्राप दिया, ‘आपने मेरे आदेशों की अवहेलना की है। आपने किसान के खेत से चोरी की है। इन सबके एवज में अब आपको 12 साल तक किसान के घर पर रहकर उसकी सेवा करनी होगी। माता लक्ष्मी को पृथ्वी पर छोड़कर भगवान विष्णु क्षीरसागर वापस चले गए।

12 साल तक मां लक्ष्मी किसान के घर में रहीं और उन्हें धन, अनाज और रत्नों और गहनों से भर दिया। जैसे ही 13वां वर्ष हुआ, श्राप पूरा हुआ और भगवान विष्णु मां लक्ष्मी को अपने साथ लेकर पृथ्वी पर लौट आए। भगवान विष्णु को देखकर किसान ने लक्ष्मीजी को अपने साथ भेजने से मना कर दिया।

तब विष्णुजी ने किसान को समझाया कि लक्ष्मीजी को आज तक कोई नहीं रोक पाया है। वह आज इधर, कल उधर है। मेरे श्राप के कारण वह 12 साल तक तुम्हारे साथ रही, लेकिन अब उसके जाने का समय हो गया है। इसके बाद भी किसान नहीं माना और लक्ष्मीजी को न भेजने की जिद करने लगा।

तब लक्ष्मीजी ने उपाय सुझाया। उन्होंने कहा, जैसा मैं कहता हूं वैसा ही करना होगा। तब लक्ष्मीजी ने कहा, कल तेरस है। आप अपने घर को साफ-सफाई करके शाम को घी का दीपक जलाकर मेरी पूजा करें। एक तांबे के कलश में सिक्के भरकर मेरे पास रख दें। मैं उस कलश में निवास करूँगी। तब मैं तुम्हारे घर में एक वर्ष तक निवास करूँगी। किसान ने वैसा ही किया और उसका घर भी धन-धान्य से भर गया। तब से हर साल कार्तिक मास के कृष्ण पक्ष की तेरस को धनतेरस के रूप में मनाया जाता है।

दिूतीय कथा (second story) –

एक अन्य पौराणिक कथा के अनुसार, भगवान विष्णु ने देवताओं को राजा बलि के भय से मुक्त करने के लिए वामन अवतार लिया और वामन अवतार के रूप में राजा बलि के यज्ञ स्थल पर चले गए। लेकिन शुक्राचार्य ने वामन अवतार में भगवान विष्णु को पहचान लिया था। शुक्राचार्य ने राजा बलि से अनुरोध किया कि वामन कुछ भी मांगे तो उसे मना कर दें, अर्थात कुछ भी दान न करें।

राजा बलि ने ऋषि शुक्राचार्य की बातों को महत्वपूर्ण ना मान कर उनकी बात नहीं मानी। वामन रूप में भगवान विष्णु ने राजा बलि से केवल तीन कदम भूमि की मांग की। जिसे राजा ने यज्ञ के रूप में स्वीकार कर लिया था। जब राजा बलि ने कमंडल से जल लेकर तीन पग भूमि दान करने का संकल्प लिया, तभी ऋषि शुक्राचार्य लघु रूप धारण करके राजा बलि के कमंडल में प्रवेश कर गए। जिससे कमंडल से पानी का रास्ता बंद हो गया।

वामन भगवान ऋषि शुक्राचार्य की इस बात से अच्छी तरह वाकिफ थे। भगवान वामन ने कुश को अपने हाथ में इस प्रकार रखा कि शुक्राचार्य की एक आंख फट गई और शुक्राचार्य चोट के कारण कमंडल से बाहर आ गए। तब भगवान वामन ने अपने एक पैर से पूरी पृथ्वी को और दूसरे पैर से अंतरिक्ष को नापा था।

तीसरे पग के लिए कोई जगह नहीं बची, तब राजा बलि ने अपना सिर भगवान वामन के चरणों में रख दिया और इस तरह राजा बलि की मृत्यु हो गई। इसी प्रकार भगवान वामन ने देवताओं को राजा बलि के भय से मुक्ति दिलाई थी। राजा बलि ने जो धन और संपत्ति सभी देवताओं से अपने वश में कर ली थी, वह फिर से सभी देवताओं को वापस कर दी गई। इसलिए भी धनतेरस का पर्व मनाया जाता है।

आज की इस पोस्ट dhanteras 2022 को पढ़ने के लिए आपका धन्यवाद दोस्तों। आशा करता हूँ, धनतेरस के बारे में आपको पूरी जानकारी प्राप्त हो गई होगी। अगर आपको यह पोस्ट अच्छी लगी हो तो इसे सोशल मीडिया पर जरूर शेयर करना।

यह भी पढ़े –

दिवाली 2021 कब है, जानें तिथि एवं शुभ मुहूर्त
दीवाली पर निबंध
विजयदशमी 2021 कब है, शुभ मुहूर्त व पूजा विधि
होली पर निबंध

Leave a Comment

Your email address will not be published.